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मनुष्यगणों की दुर्दशा और उससे मुक्ति का उपाय।

  • Writer: The Symbol of Faith
    The Symbol of Faith
  • Aug 12, 2024
  • 1 min read

Updated: Aug 17, 2024

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मनुष्यगणों की दुर्दशा और उससे मुक्ति का उपाय।


श्रीश्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती गोस्वामी ठाकुर परमहंस जगद्गुरु श्रील प्रभुपाद


फिर, विभिन्न पंथों को मानने वाले लोगों के श्रीचैतन्यदेव के वाणी की चर्चा न करने से अर्थात एक सच्चे चैतन्यभक्त से निष्पक्ष रूप से चैतन्यदेव की वाणी न सुनने से, विभिन्न प्रकार के मनधर्मों के प्रति आकर्षित हो गए हैं। चैतन्यदेव की वाणी न कानों तक न पहुँँने के फलस्वरूप कितने लोग भटक गये हैं और विभिन्न नये-नये काल्पनिक पथों को ग्रहण कर कुुपथ और विपथ में चले गए और जा भी रहे हैं। यदि किसी सच्चे चैतन्यानुगत भक्त के प्रकृष्ठ संग के प्रभाव से श्रीचैतन्यदेव की भक्तिसिद्धान्तवाणी के शब्द कभी उनके कानों में पड़े होते, तो विपरीत मार्ग में भटक जाने जैसा इतना घोर दुर्भाग्य उनके भाग्य में हमें देखने को नहीं मिलता। श्रीचैतन्यदेव के अप्रकट होने के बाद, विभिन्न धर्मपंंथियोंउकाब उदय हुआ और आज तक होना जारी हैं। धर्म के वे सभी अनुयायी सोचते हैं कि संसार के लोग चैतन्य से अधिक, उन्हें प्रेम करेंगे; क्योंकि, वे लोगों के मन को मनोधर्म के अनुकूल इंद्रिय-संतोषजनक सिद्धांतो से आनंद देनें में सक्षम हैं।

 
 
 

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